Friday, March 20, 2020

मिर्ज़ा ग़ालिब की 10 नायाब ग़ज़लें ब-उन्वान 'इश्क़' और 'दर्द' | Moods of Ghalib | Salahuddin Ansari

मिर्ज़ा असद उल्लाह ख़ाँ ग़ालिब 

ख़ुदादाद सलाहियतों के मालिक मिर्ज़ा असद उल्लाह ख़ाँ 'ग़ालिब' Mirza Asad Ullah Khan Ghalib (1797- 1869) उर्दू के नायाब शायरों में गिने जाते हैं. फ़ारसी और उर्दू शायरी में उन्होंने अपना एक बुलंद मक़ाम बनाया।

मिर्ज़ा ग़ालिब के अदबी शाहकार  

साल
अदबी कारनामा (उपलब्धियां)
1841
सय्यदुल अख़बार ने दिल्ली से दीवाने ग़ालिब का पहला एडिशन छापा
1845
फ़ारसी दीवान ‘मैख़ाने-आरज़ू’ के नाम से छपा.
1847
उर्दू दीवान का दूसरा एडिशन मंज़रे-आम पर आया.
1849
फ़ारसी किताब ‘पंज-आहंग’ छपी

ग़ालिब की शायरी में बेपनाह उपलब्धियों को देखते हुए, 1850 में मुग़लिया  सल्तनत के आख़री  बादशाह बहादुर शाह ज़फर (1775-1862) ने ‘नज्मुद्दौला दबीरुल्मुल्क निज़ाम’ लक़ब (सम्मानसे नवाज़ा


ग़ालिब 10 मशहूर और नायब ग़ज़लें 

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ghalib poetry
मिर्ज़ा असद उल्लाह खान 'ग़ालिब'
(Mirza Asad Ullah Khan Ghalib)















[1]
क्यूँ जल गया ताबे-रुखे-यार देखकर
क्यूँ जल गया न ताबे-रुख़े-यार देखकर
जलता हूँ अपनी ताक़ते-दीदार देखकर
आतिश-परस्त कहते हैं अहले-जहाँ मुझे
सरगर्मे-नाला-हाए-शरर-बार देखकर
क्या आबरूए-इश्क़ जहाँ आम हो जफ़ा
रुकता हूँ तुम को बेसबब आज़ार देखकर
आता है मेरे क़त्ल को पर जोशे-रश्क से
मरता हूँ उसके हाथ में तलवार देखकर
साबित हुआ है गर्दने-मीना पे ख़ूने-ख़ल्क़
लरज़े है मौजे-मय तेरी रफ़्तार देखकर
वा-हसरता कि यार ने खींचा सितम से हाथ
हमको हरीसे-लज़्ज़ते-आज़ार देखकर
बिक जाते हैं हम आप मताए-सुख़न के साथ
लेकिन अयारे-तबअए-ख़रीदार देखकर
ज़ुन्नार बाँध सुब्हए-सद-दाना तोड़ डाल
रहरौ चले है राह को हमवार देखकर
इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं
जी ख़ुश हुआ है राह को पुरख़ार देखकर
क्या बदगुमाँ है मुझसे कि आईने में मेरे
तूती का अक्स समझे है ज़ंगार देखकर
गिरनी थी हम पे बर्क़े-तजल्ली, न तूर पर
देते हैं बादा ज़र्फ़े-क़दह-ख़्वार देखकर
सर फोड़ना वो ग़ालिबे-शोरीदा हाल का
याद आ गया मुझे तेरी दीवार देखकर

[2]  
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक
दामे-हर-मौज में है हल्क़ए-सद-कामे-निहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ूने-जिगर होने तक
हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक
परतवे-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक
यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सते-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मीए-बज़्म है इक रक़्से-शरर होने तक
ग़मे-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक


[3] 
मेहरबाँ होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मेहरबाँ होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ
ज़ोफ़ में तानए-अग़्यार का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ
ज़हर मिलता ही नहीं मुझ को सितमगर वरना
क्या क़सम है तेरे मिलने की कि खा भी न सकूँ

[4]
दिल ही तो है  संगो-ख़िश्त दर्द से भर  आए क्यूँ
दिल ही तो है  संगो-ख़िश्त दर्द से भर  आए क्यूँ
रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ
दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ
जब वो जमाले-दिल-फ़रोज़ सूरते-मेहरे-नीमरोज़
आप ही हो नज़्ज़ारा-सोज़ पर्दे में मुँह छुपाए क्यूँ
दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावके-नाज़ बेपनाह
तेरा ही अक्से-रुख़ सही सामने तेरे आए क्यूँ
क़ैदे-हयातो बंदे-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ
हुस्न और उस पे हुस्ने-ज़न रह गई बुल-हवस की शर्म
अपने पे एतमाद है ग़ैर को आज़माए क्यूँ
वाँ वो ग़ुरूरे-इज़्ज़ो-नाज़ याँ ये हिजाबे-पासे-वज़अ
राह में हम मिलें कहाँ बज़्म में वो बुलाए क्यूँ
हाँ वो नहीं ख़ुदा-परस्त जाओ वो बेवफ़ा सही
जिसको हो दीनो दिल अज़ीज़ उसकी गली में जाए क्यूँ
ग़ालिबे-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूँ

[5]
किसी को देके दिल कोई नवा-संजे-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो 
किसी को देके दिल कोई नवा-संजे-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुँह में ज़बाँ क्यूँ हो
वो अपनी ख़ू न छोड़ेंगे हम अपनी वज़्अ क्यूँ छोड़ें
सुबुक-सर बनके क्या पूछें कि हम से सरगिराँ क्यूँ हो
किया ग़मख़्वार ने रुस्वा लगे आग इस मोहब्बत को
न लावे ताब जो ग़म की वो मेरा राज़दाँ क्यूँ हो
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-दिल तेरा ही संगे-आस्ताँ क्यूँ हो
क़फ़स में मुझ से रूदादे-चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यूँ हो
ये कह सकते हो हम दिल में नहीं हैं पर ये बतलाओ
कि जब दिल में तुम्हीं तुम हो तो आँखों से निहाँ क्यूँ हो
ग़लत है जज़्बए-दिल का शिकवा देखो जुर्म किसका है
न खींचो गर तुम अपने को कशाकश दरमियाँ क्यूँ हो
ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है
हुए तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमाँ क्यूँ हो
यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यूँ हो
कहा तुम ने कि क्यूँ हो ग़ैर के मिलने में रुस्वाई
बजा कहते हो सच कहते हो फिर कहियो कि हाँ क्यूँ हो
निकाला चाहता है काम क्या तानों से तू 'ग़ालिब'
तेरे बेमेहर कहने से वो तुझ पर मेहरबाँ क्यूँ हो


[6]

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही

मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही

क़त्अ कीजिए न तअल्लुक़ हमसे

कुछ नहीं है तो अदावत ही सही
मेरे होने में है क्या रुस्वाई
ऐ, वो मज्लिस नहीं ख़ल्वत ही सही
हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने
ग़ैर को तुझ से मोहब्बत ही सही
अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही
उम्र हरचंद कि है बर्क़-ख़िराम
दिल के ख़ूँ करने की फ़ुर्सत ही सही
हम कोई तर्के-वफ़ा करते हैं
न सही इश्क़ मुसीबत ही सही
कुछ तो दे ऐ फ़लके-नाइंसाफ़
आहो फ़रियाद की रुख़्सत ही सही
हम भी तस्लीम की ख़ू डालेंगे
बेनियाज़ी तेरी आदत ही सही
यार से छेड़ चली जाए 'असद'
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही


[7]

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई

दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई

शक़ हो गया है सीना ख़ुशा लज़्ज़ते-फ़राग़
तकलीफ़े-पर्दा-दारीए-ज़ख़्मे-जिगर गई
वो बादए-शबाना की सरमस्तियाँ कहाँ
उठिए बस अब कि लज़्ज़ते-ख़्वाबे-सहर गई
उड़ती फिरे है ख़ाक मेरी कूए-यार में
बारे अब ऐ हवा! हवसे-बालो-पर गई
देखो तो दिल-फ़रेबीए-अंदाज़े-नक़्शे-पा
मौजे-ख़िरामे-यार भी क्या गुल कतर गई
हर बुलहवस ने हुस्न-परस्ती शिआर की
अब आबरूए-शेवए-अहले-नज़र गई
नज़्ज़ारे ने भी काम किया वाँ नक़ाब का
मस्ती से हर निगह तेरे रुख़ पर बिखर गई
फ़र्दा व दी का तफ़रक़ा यक बार मिट गया
कल तुम गए कि हम पे क़यामत गुज़र गई
मारा ज़माने ने असदुल्लाह ख़ाँ! तुम्हें
वो वलवले कहाँ वो जवानी किधर गई


[8]
ज़ुल्मतकदे में मेरे शबे-ग़म का जोश है 
ज़ुल्मतकदे में मेरे शबे-ग़म का जोश है

इक शम्अ है दलीले-सहर सो ख़मोश है

ने मुज़्दए-विसाल न नज़्ज़ारए-जमाल
मुद्दत हुई कि आश्तीए-चश्मो-गोश है
मय ने किया है हुस्ने-ख़ुदआरा को बेहिजाब
ऐ शौक़! हाँ इजाज़ते-तस्लीमे-होश है
गौहर को अक़्दे-गर्दने-ख़ूबाँ में देखना
क्या औज पर सितारए-गौहर-फ़रोश है
दीदार बादा हौसला साक़ी निगाह मस्त
बज़्मे-ख़याल मयकदए-बेख़रोश है
देखो मुझे जो दीदए-इबरत-निगाह हो
मेरी सुनो जो गोशए-नसीहत-नेओश है
साक़ी-ब-जल्वा दुश्मने-ईमानो-आगही
मुतरिब ब-नग़्मा रहज़ने-तम्कीनो-होश है
या शब को देखते थे कि हर गोशए-बिसात
दामाने-बाग़बानो कफ़े-गुल-फ़रोश है
या सुब्ह-दम जो देखिए आकर तो बज़्म में
ने वो सुरूरो सोज़ न जोशो-ख़रोश है
दाग़े-फ़िराक़े-सोहबते-शब की जली हुई
इक शम्अ रह गई है सो वो भी ख़मोश है
आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
'ग़ालिबसरीरे-ख़ामा नवाए-सरोश है

[9]
हर एक बात पे कहते हो तुम कि “तू क्या है?”
हर एक बात पे कहते हो तुम कि “तू क्या है?”
तुम्हीं कहो कि “ये अंदाज़े-गुफ़्तुगू क्या है?”
न शोले में ये करिश्मा, न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोख़े-तुंद-ख़ू क्या है
ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न तुमसे
वगरना ख़ौफ़े-बदआमोज़ीए-अदू क्या है
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जैब को अब हाजते-रफ़ू क्या है
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादए-गुलफ़ामे-मुश्कबू क्या है
पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
ये शीशाओ क़दहो कूज़ओ सुबू क्या है
रही न ताक़ते-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिबकी आबरू क्या है

[10]
बाज़ीचए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
बाज़ीचए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे
इक खेल है औरंगे-सुलैमाँ मेरे नज़दीक
इक बात है एजाज़े-मसीहा मेरे आगे
जुज़ नाम नहीं सूरते-आलम मुझे मंज़ूर
जुज़ वहम नहीं हस्तीए-अशिया मेरे आगे
होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे
सच कहते हो, ख़ुदबीनो ख़ुद-आरा हूँ न क्यूँ हूँ?
बैठा है बुते-आइना-सीमा मेरे आगे
फिर देखिए अंदाज़े-गुल-अफ़्शानीए-गुफ़्तार
रख दे कोई पैमानए-सहबा मेरे आगे
नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है मैं रश्क से गुज़रा
क्यूँकर कहूँ, “लो नाम न उनका मेरे आगे”
ईमाँ मुझे रोके है, जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे
आशिक़ हूँ, प माशूक़-फ़रेबी है मेरा काम
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मेरे आगे
ख़ुश होते हैं, पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते
आई शबे-हिज्राँ की तमन्ना मेरे आगे
है मौजज़न इक क़ुल्ज़ुमे-ख़ूँ काश! यही हो
आता है अभी देखिए क्या क्या मिरे आगे
गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़रो-मीना मेरे आगे
हम-पेशाओ हम-मशरबो हमराज़ है मेरा
'ग़ालिबको बुरा क्यूँ कहो, अच्छा, मेरे आगे?


इसके अलावा ग़ालिब की तीन मशहूर ग़ज़लें। ... यह न थी हमारी क़िस्मत कि विसाले-यार होता  ... , हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले ... दिले-नादाँ तुझे हुआ क्या है... हमने अपने पहले ब्लॉग 'अपनी ज़ाती किताबों से महरूम हिन्दुस्तान का अज़ीमुश्शान शायर 'ग़ालिब'  में शामिल  कर दिया है, आप लिंक पर जाकर पढ़ सकते  हैं. 


सलाहुद्दीन अंसारी
शोधकर्ता एवं सम्पादक
अंदाज़े बयाँमिर्ज़ा ग़ालिब
Mirza Ghalib 
Urdu Shayri 


ग़ालिब की शायरी से पूरी तरह लुत्फ़-अन्दोज़ होना चाहते हैं तोhttps://www.amazon.in/Salahuddin-Ansari/e/B0859VGL3X… पर मौजूद किताब "अंदाज़े-बयाँमिर्ज़ा ग़ालिब" किन्डल एडिशन में दस्तयाब हैं

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